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Dosopakramaniya adhyaya AIAPGET MCQs

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13.Dosopakramaniya adhyaya

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सामुद्ग औषध काल प्रयुक्त होता है -
Sāmudga aushadha kāla is advised in

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सौम्या भावा: पय: सर्पिविरेकश्च विशेषत: चिकित्सा है -
"Saumyā bhāvāh payah sarpi virekashcha visheshatah" is treatment of

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उष्माणोsबलत्वेन धातुमादयंपाचितम् किसके सन्दर्भ में कहा गया है ?
"Ushamāno Abalatvena Dhātumādyamapāchitam" is said for -

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व्यान वायु का औषध काल है -
Aushadha Kāla of Vyāna vāyu is

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.............. विषच्छर्दिहिध्मातृट् श्वासकासासिषु औषध कालके सन्दर्भ में रिक्त स्थान में है -
"............ visha ch chardi hidhmā trita shvāsa kāsāsishu" fill in the blank in context of aushadha kāla

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कथन 1.अष्टांग हृदय अनुसार वातपित्त जनित रोगों में प्रायः ग्रीष्म ऋतु की चर्या का सेवन करना चाहिए। कथन 2. अष्टांग हृदय अनुसार कफपित्त जनित रोगों में प्रायः शरद ऋतु की चर्या का सेवन करना चाहिए ।
Statement 1- According to Ashtānga Hrudya, in disorders of Vāta Pitta, Grīshma Ritu charya should be followed. Statement 2- According to Ashtānga Hrudya, in diseases of Kapha Pitta, Sharada Ritu charya should be followed.

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. श्लेष्म दोष का उपक्रम है -
Upakrama of Shleshma dosha is

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कफपित्त जनित रोगों में प्रायः किस ऋतू की चर्या का सेवन करना चाहिए ?
Which Ritu charyā should be followed for kapha pitta diseases

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किस दोष उपक्रम में सुखशीलता का उल्लेख है -
Sukha shīlatā is explained in which dosha upakrama

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. 'शमयेत्तान प्रयोगेण सुखं वा कोष्ठामानयेत' किसकी चिकित्सा के बारे मे कहा गया है
"Shamyettāna prayogena sukham vā koshthāmānayeta" has been said for the treatment of

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दोष के शाखा से कोष्ठ में गमन करने का कारण नही है -
Which of the following is not a reason of movement of doshas from shākhā to koshtha

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कथन 1. अष्टांग हृदय अनुसार जो चिकित्सा एक रोग को शांत कर दूसरे रोग को उत्पन्न करे उसे विशुद्ध चिकित्सा कहते हैं । कथन 2.. अष्टांग हृदय अनुसार जो चिकित्सा एक रोग को शांत कर दूसरे रोग को उत्पन्न न करे उसे विशुद्ध चिकित्सा कहते हैं ।
Statement 1- According to the Ashtanga Hrudya, the Chikitsā which calms down one disease and produces another disease is called Vishuddha Chikitsā. Statement 2- The Chikitsā which calms one disease and does not cause another disease is called Vishuddha Chikitsā.

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विशेषानमेद्यपिशितरसतैलानुवासनं किस दोष की चिकित्सा है -
"Visheshānamedhyapishitarasatailānuvāsanam" is treatment of which dosha

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अयन्त्रण सुखं मित्रं पुत्र: संदिग्धमुग्धवाक् किस दोष की चिकित्सा है -
"Ayantrana sukham mitram putrah samdigdhamugdhavāk" is treatment of which dosha

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अष्टांग हृदय अनुसार वात के चिकित्सा उपक्रमों में सम्मिलित नहीं है -
Which of the following is not included in chikitsā upakrama of Vāta according to Ashtāmga Hridaya

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वाग्भट्ट अनुसार उर्ध्वजत्रुगत व्याधि में औषधि सेवन काल होगा?
According to Vāgabhatta, aushadhī sevana kāla in urdhavajatrugata roga is

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कफ दोष की चिकित्सा में विषेश रूप से प्रयुक्त है -
Which of the following is specially given for the treatment of kapha dosha

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शाखा से कोष्ठ में गमन का कारण है -
Reason of movement from shākhā to koshtha is

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दीपनै: पाचनै: सिद्धा: स्नेहाश्चानेक योनय: किस दोष की चिकित्सा है -
"Dīpanaih pāchanaih siddhāh snehāshchāneka yonyah" is treatment of which dosha

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अष्टांग हृदय मतानुसार, मृदु संशोधन किसका दोष उपक्रम है ?
According to Ashtanga Hridaya, Mridu Samshodhana is the doshapakrama of -

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उष्मणोsल्पबलत्वेन् धातुमाद्यमपाचितम्' किसके लिए कहा गया है
"Ushmano alpabalatvena dhātumādhyamapāchitam" this has been said for

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चय एव जयेद्दोषं कुपितं त्वविरोधयन् सन्दर्भ है -
"Chaya evam jayetadosham kupitam tvavirodhayana" find the correct reference

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कथन 1. अष्टांग हृदय अनुसार मृदु संशोधन वायु का उपक्रम हैं । कथन 2. अष्टांग हृदय अनुसार तीक्ष्ण संशोधन वायु का उपक्रम हैं ।
Statement 1- According to Ashtānga Hrudya, Mrudu Samshodhana is the Upakrama of Vāyu. Statement 2- According to Ashtānga Hrudya, Tīkshna Samshodhana is the Upakrama of Vāyu.

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अन्य स्थान गत दोष की चिकित्सा के सन्दर्भ में सही कथन है -
The right statement regarding the treatment of the Dosha which migrate to other place

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कथन 1. अष्टांग हृदय अनुसार समान वायु की कुपित होने पर भोजन के मध्य में औषधी देना चाहिए। कथन 2. अष्टांग हृदय अनुसार व्यान वायु की कुपित होने पर भोजन के अंत में औषधी देना चाहिए।
Statement 1- According to Ashtānga Hrudya, in vitiation of Samāna Vāyu, medicine should be given in between meal. Statement 2- According to Ashtānga Hrudya, in vitiation of Vyāna Vāyu, medicine should be given at the end of meal.

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वात -पित्त - कफ का निर्हरण करना चाहिए क्रमशः -
Vata, pitta, kapha should be removed repspectively

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समान वायु की विकृति में औषध काल है -
Aushadha Kāla in Samāna vāyu vikriti is

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वाग्भट के अनुसार उर्ध्वजत्रुगत व्याधियों में औषधि सेवन काल क्या बताया गया है ?
Aushadha sevana kāla in UrdhavaJatrugata vyādhi according to Vāgabhatta

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कथन 1. अष्टांग हृदय अनुसार ग्रीष्म में संचित वायु को श्रावण मास में शरीर से शोधन द्वारा निकाले। कथन 2.अष्टांग हृदय अनुसार वर्षा में संचित पित्त को श्रावण मास में शरीर से शोधन द्वारा निकाले।
Statement 1- According to Ashtānga Hrudya, Vāyu accumulated in Grīshma should be removed from body in Shrāvana month by Shodhana. Statement 2- According to Ashtānga Hrudya, Pitta accumulated in Varshā should be removed from body in Shrāvana month by Shodhana.

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वाग्भट के अनुसार वातिक पुरुषों को कौन सा 'मद्य'(मदिरा) पीना चाहिए
Vātika people should drink which type of madhya according to Vāgabhatta

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अष्टाङ्ग हृदय अनुसार वात चिकित्सा उपक्रम में सम्मिलित नहीं है -
Which of the following is not included in Vāta chikitsā upakrama according to Ashtāmga Hridaya

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दीर्घ काल स्थित मद्य किस विकारों की चिकित्सा है
Dīrghakāla sthita madhya is used for the treatment of which diseases

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आचार्य वाग्भट ने पित्त का शोधन किस माह में कहा है
Āchārya Vāgabhatta has advised pitta shodhana in which month

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अष्टांग ह्रदय के अनुसार वात के चिकित्सा उपक्रमों में सम्मिलित नहीं है -
According to Ashtānga Hrudya, Following is not included in Chikitsā Upakrama of Vāta -

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कथन 1. अष्टांग हृदय अनुसार मुख से दिया गया द्रव्य पक्वाशय के रोगो को शीघ्र नष्ट करता हैं । कथन 2.अष्टांग हृदय अनुसार गुदा से दिया गया द्रव आमाशय के रोगो को शीघ्र नष्ट करता हैं ।
Statement 1- According to Ashtānga Hrudya, medicine given from mouth destroys diseases of Pakvāshaya. Statement 2- According to Ashtānga Hrudya, medicine given from anal destroys diseases of Āmāshaya.

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रतिप्रीति: प्रजागर: किस दोष की चिकित्सा है ?
"Ratiprītih prajāgarah" is treatment of which dosha

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नि: सुखत्वं सुखाय च ........ किस दोष की चिकित्सा है -
"Nih sukhatvam sukhāya cha......." this is treatment of which dosha

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वात दोष का विशेष कर्म है -
Vishesha upakrama of Vāta dosha is

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प्रयोजयेत्कियां प्राप्तां क्रियाकालं न हापयेत्।। का सन्दर्भ है -
"Prayojayetkiyām prāptām kriyākālam na hāpayeta" find the correct reference

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औषध काल का वर्णन मिलता है-
Where is Aushadha Kāla explained

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अष्टांग हृदय के अनुसार छर्दि व्याधि का औषधि काल कौन सा है?
Aushadha Kāla of chardi according to Ashtāmga Hridaya is

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कुर्यान्न तेषु त्वरया देहाग्निबलवित् क्रियां किस प्रकार के दोष की चिकित्सा है ?
"Kuryānna teshu tvarayā dehāgnibalavit kriyām" is treatment of which type of dosha

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किस दोष उपक्रम में सुखशीलता का उल्लेख है -
Sukha shīlatā is explained in which dosha upakrama

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कथन 1.अष्टांग हृदय अनुसार वर्षा में संचित पित्त को श्रावण मास में शरीर से शोधन द्वारा निकाले। कथन 2. अष्टांग हृदय अनुसार हेमंत में संचित कफ को चैत्र मास में शरीर से शोधन द्वारा निकाले।
Statement 1 According to Ashtānga Hrudya, Pitta accumulated in Varshā should be removed from body in Shrāvana month through Shodhana. Statement 2- According to Ashtānga Hrudya, Kapha accumulated in Hemanta should be removed from body in Chaitra month through Shodhana.

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कथन 1. अष्टांग हृदय अनुसार अपान वायु की कुपित होने पर अन्न के प्रारंभ में औषधी देना चाहिए। कथन 2. अष्टांग हृदय अनुसार समान वायु की कुपित होने पर अन्न के प्रारंभ में औषधी देना चाहिए।
Statement 1- According to Ashtānga Hrudya, in vitiation of Apna Vāyu, medicine should be given at the start of meal. Statement 2- According to Ashtānga Hrudya, in vitiation of Samāna Vāyu, medicine should be given at the start of meal.

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दोषो के कोष्ठ से शाखा में गमन करने का कारण नही है -
Which of the following is not a reason of movement of doshas from koshtha to shākhā

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कथन 1.अष्टांग हृदय अनुसार "वेष्टनं त्रासनं सेको मद्यम् पैष्टिकगौडिकम' कफ दोष की चिकित्सा है । कथन 2. अष्टांग हृदय अनुसार "वेष्टनं त्रासनं सेको मद्यम् पैष्टिकगौडिकम' वात दोष की चिकित्सा है ।
Statement 1- According to Ashtānga Hrudya, "Veshtanam Trāsanam Seko Madyam Paushtikagaudikam" is the treatment of Kapha Dosha. Statement 2- According to Ashtānga Hrudya, "Veshtanam Trāsanam Seko Madyam Paushtikagaudikam" is the treatment of Vāta Dosha.

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..........विगुणेऽपाने औषध काल के सन्दर्भ में रिक्त स्थान में है -
".............vigune apāne" fill in the blank in context of aushadha kāla

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वेष्टनं त्रासनं सेको मद्यम् पैष्टिकगौडिकम' किस दोष की चिकित्सा है
"Veshtanam trāsanam seko madhyam paishtika gaudikam" is treatment of which dosha

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स्त्रोतोरोधबलभ्रंश गौरवानिलमूढता: किसका लक्षण है ?
"Srotorodha balabhramsha gauravānila mūdhatāh" is the symptom of

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अरोचक में औषध काल है -
Aushadha Kāla in Arochaka

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प्रदोषचन्द्रमा: सौद्यं हारि ......... किस दोष उपक्रम है -
"Pradosha chandramāh saudhyam hāri......" this is dosha upakrama

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कफ दोष का विशेष उपक्रम है -
Vishesha upakrama of kapha dosha is

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नि:सुखत्वं सुखाय च निम्नलिखित में से किसका चिकित्सा सिद्धान्त है ?
"Nihsukhatvam Sukhāya Cha" is the principal of treatment for which of the following ?

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कफवात जनित रोगों में प्रायः किस ऋतू की चर्या का सेवन करना चाहिए
Which ritu charyā should be followed in Vāta kapha disease

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उदान वायु की विकृति में औषध काल है -
Aushadha kāla in udāna vāyu vikriti is

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निम्न मे साम रोग का/के लक्षण है
Which of the following are symptoms of Sāma roga

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कथन 1. अष्टांग हृदय अनुसार "सौम्या भावाः पयः सर्पिविरेकश्च विशेषतः" पित्त की चिकित्सा के संदर्भ में कहा है । कथन 2. अष्टांग हृदय अनुसार कफ की चिकित्सा में रात्रि शयन का विधान हैं ।
Statement 1- According to Ashtānga Hrudya, "Saumyā Bhāvāh Payah Sarpivirekashcha Visheshtah" is said in context to treatment of Pitta. Statement 2- According to Ashtānga Hrudya, Rātri Shayana is adviced in the treatment of Kapha.

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कथन 1. अष्टांग हृदय अनुसार कफ की चिकित्सा में "दीर्घकालस्थित मद्य" का विधान हैं । कथन 2. अष्टांग हृदय अनुसार वायु की चिकित्सा में "दीर्घकालस्थित मद्य" का विधान हैं ।
Statement 1- According to Ashtānga Hrudya, in the treatment of Kapha, "Dīrghakālīna Madya" is indicated. Statement 2- According to Ashtānga Hrudya, in the treatment of Vāyu, "Dīrghakālīna Madya" is indicated.

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बलवान रोगी के लिए उपयुक्त औषध काल है -
Aushadha Kāla for balavāna rogi

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पित्त दोष का विशेष उपक्रम है -
Vishesha upakrama of Pitta dosha is

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........ एव जयेद्दोषं
.......... eva jayeta dosham

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कथन 1.अष्टांग हृदय अनुसार वातपित्त जनित रोगों में प्रायः शरद ऋतु की चर्या का सेवन करना चाहिए। कथन 2. अष्टांग हृदय अनुसार कफपित्त जनित रोगों में प्रायः ग्रीष्म ऋतु की चर्या का सेवन करना चाहिए ।
Statement 1- According to Ashtānga Hrudya, in diseases of Vāta Pitta, Sharada Ritu Charyā should be followed. Statement 2- According to Ashtānga Hrudya, in disorders of Kapha Pitta, Grīshma Ritu Charyā should be followed.

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हिक्का में उपयुक्त औषध सेवन काल है
Aushadha sevana kāla in Hikkā is

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कफ दोष की चिकित्सा में किस तरह का विरेचन देते है
What type of Virechana is given for the treatment of Kapha dosha

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कफ प्रधान व्याधियों में औषध कालहोता है -
Aushadha Kāla in kapha pradhāna Vyādhi is

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. "दुष्टं ........रसमामं प्रचक्षते ।" रिक्त स्थान में है-
"Dushtam.........rasamāmam prachakshate" fill in the blank

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अष्टांगहृदय ने आम के सन्दर्भ में किसका उदाहरण दिया है
What example did Ashtāmga Hridaya give in the context of Āma

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उष्मणोऽअल्पबलत्वेन धातुमाद्यमपाचितं -किस रोग के सन्दर्भ में वर्णित है ?
"Ushmano alpabalatvena dhātumādhyamapāchitam" this is explained in context of which disease

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कथन 1. अष्टांग हृदय अनुसार हेमंत में संचित कफ को चैत्र मास में शरीर से शोधन द्वारा निकाले। कथन 2.अष्टांग हृदय अनुसार ग्रीष्म में संचित वायु को श्रावण मास में शरीर से शोधन द्वारा निकाले।
Statement 1- According to Ashtānga Hrudya, Kapha acculumated in Hemanta should be removed from the body through Shodhana in Chaitra month. Statement 2- According to Ashtānga Hrudya, Vāyu acculumated in Grīshma should be removed from the body through Shodhana in Shrāvana month.

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. प्राण वायु विकृति में औषध काल है-
Aushadha kāla in Prāna vāyu vikriti

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रतिप्रीति किस दोष की चिकित्सा है ?
Rati prīti is treatment of which dosha

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वातपित्त जनित रोगों में प्रायः किस ऋतू की चर्या का सेवन करना चाहिए-
Which Ritu charyā should be followed in Vāta pitta diseases

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कथन 1. अष्टांग हृदय में औषध काल दस बताए हैं । कथन 2. अष्टांग हृदय अनुसार औषध काल पांच हैं ।
Statement 1- Ten Aushadha Kāla are mentioned in Ashtānga Hrudya. Statement 2- According to Ashtānga Hrudya, Aushadha Kāla are Five.

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A. अष्टांग हृदय अनुसार ऊपर या नीचे प्रेरित हुए अथवा स्वयं बाहर निकलते हुए आम दोषों को औषोधियो से नहीं रोकना चाहिए । R. ऐसा न करने से रुके हुए आम दोष अन्य व्याधी को उत्पन्न करते है ।
A : According to Ashtānga Hrudya, Sāma doshas induced up or down or coming out on their own should not be stopped with medicines. R. By not doing so, the Sāma Doshas that are stopped cause other diseases.

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प्रयोग: शमयेद्वयाधिमेकं योऽन्यमुदीरयेत्। नाऽसौविशुद्ध: संदर्भ है -
"Prayogah shamayedavyādhimekam yoanyamudīrayeta nāsauvishuddhah" find the correct reference

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सामान्य सन्निपात की चिकित्सा में किस ऋतु से संबंधित उपक्रम निर्दिष्ट है -
Upakrama related to which ritu is advised for treatment of Sāmānya Sannipāta

78 / 78

अष्टाङ्ग हृदय के अनुसार औषध काल कितने है -
Number of Aushadha Kāla according to Ashtānga Hrudya is -

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